Thursday, 19 July 2018, 7:14 PM

कविता

बीट

Updated on 1 January, 2014, 18:55
मैंने देखा, सड़क पर कुछ गुंडे छेड़ रहे थे एक बच्ची को, रो रही थी वह, मदद मांग रही थी मुझसे, पर मैं चुप था, बहुत डरा हुआ था, हँस रहे थे गुंडे, बेबस थी वह बच्ची. डाल पर बैठा एक कौवा सब कुछ देख रहा था, चिल्ला रहा था गला फाड़कर, किए जा रहा था काँव-काँव, पर बेबस था वह भी. अंत में... आगे पढ़े

साल नया फिर आया

Updated on 29 December, 2013, 22:21
लो साल नया फिर आया बच्चों इतिहास नायाब इस बार तुम रचो, बुरी आदतें अब तुरंत तुम छोड़ो बुरी संगत से भी अपना मुंह मोड़ो, कर लो बच्चों तुम एक यह प्रण सेवा में सबकी रहना है अर्पण, मात-पिता व गुरु का सदा मान करो उनके आदर्शों पर अभिमान करो, पढ़-लिखकर सदा अव्वल रहना बातें सदा तुम शालीन ही... आगे पढ़े

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

Updated on 27 December, 2013, 13:43
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.. तुम मत मेरी मंजिल आसान करो.. हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते.. मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते.. सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं.. मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते.. मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे.. तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो.. मैं तूफ़ानों मे चलने का... आगे पढ़े

क्या लिखूँ..??

Updated on 27 December, 2013, 13:38
कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ.. या दिल का सारा प्यार लिखूँ.. कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखूँ या सापनो की सौगात लिखूँ.. मै खिलता सुरज आज लिखूँ या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ.. वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ.. वो पल मे बीते साल लिखूँ या सादियो लम्बी रात लिखूँ.. सागर सा... आगे पढ़े

पर्वत-सी पीर

Updated on 6 December, 2013, 13:06
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश... आगे पढ़े

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ

Updated on 5 December, 2013, 13:21
हरिवंश राय 'बच्चन' सोचा करता बैठ अकेले, गत जीवन के सुख-दुख झेले, दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! नहीं खोजने जाता मरहम, होकर अपने प्रति अति निर्मम, उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! आह निकल मुख से जाती है, मानव की... आगे पढ़े

आज मानव का सुनहला प्रात है

Updated on 4 December, 2013, 12:41
आज मानव का सुनहला प्रात है, आज विस्मृत का मृदुल आघात है; आज अलसित और मादकता-भरे, सुखद सपनों से शिथिल यह गात है; मानिनी हँसकर हृदय को खोल दो, आज तो तुम प्यार से कुछ बोल दो । आज सौरभ में भरा उच्छ्‌वास है, आज कम्पित-भ्रमित-सा बातास है; आज शतदल पर मुदित सा झूलता, कर रहा अठखेलियाँ हिमहास है; लाज... आगे पढ़े

बहुत खूबसूरत समॉ चाहती हूं।

Updated on 3 December, 2013, 17:20
(उषा यादव जी देश की प्रमुख गज़ल़कारों में शुमार की जाती हैं. वर्ष 1991 से लगातार देश की विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में उऩकी ग़ज़लें पाठकों को आनंदित करती रहती हैं . उनकी प्रकाशित रचनाएं अमराईयां औऱ सोजे निहाँ काफी पसंद की जाती हैं . विद्यावाचस्पति , सारस्वत सम्मान से... आगे पढ़े

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

Updated on 3 December, 2013, 14:15
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस गोपालप्रसाद व्यास है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं। है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।। अक्सर दुनियाँ के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।। यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर... आगे पढ़े

ताज़महल

Updated on 11 October, 2013, 12:06
(उषा यादव जी देश की प्रमुख गज़ल़कारों में शुमार की जाती हैं. वर्ष 1991 से लगातार देश की विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में उऩकी ग़ज़लें पाठकों को आनंदित करती रहती हैं . उनकी प्रकाशित रचनाएं अमराईयां औऱ सोजे निहाँ काफी पसंद की जाती हैं . विद्यावाचस्पति , सारस्वत सम्मान से... आगे पढ़े

ये प्यार नहीं है, तो क्या है

Updated on 31 August, 2013, 11:32
ये प्यार नहीं है, तो क्या है, अहसास नहीं है, तो क्या है। तन्हाई की रातों में, जब चाँद उतर आता खिड़की पर, सर्द हवाएं दे जाती हैं, दस्तक चुपके चुपके खिड़की पर। याद किसी की आती है, आंखें टिक जाती खिड़की पर, चादर पर सिलवट पड़ जाती है, और तकिया नम हो जाता है। ये प्यार नहीं है तो... आगे पढ़े

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